अम्बर के नीचे धरती के तले, कुछ दायरे हम ही तय कर लेते हैं.. जीवन की चकाचौध की, रंगीन सियासतें हम ही तय कर लेते है... दायरा... दायरों में कहाँ होती है बंदिस्त... नदी, सागर, अग्नि, आकाश, पानी, हवा तथा सरफरोश तमन्ना...!! वो..वो तो बेहद, बेख़ौफ़ बहते है... चलते है निले आसमा के तले, कभी भी न रुकने के लिए...!! दायरे न जड़े मानती है न शाखे, ना ही बेजुबान के जुबान की बाते... दायरे तो सीमाएं आँखते है.. गली, समाज, न्याय, पद, प्रतिष्ठा, कौम, नीति एवं इंसान की..अनायास इंसानियत की...!! भाटे के समय बढ़ते पानी के समान आओ तोड़ दो..ये दायरे नदी के दो सिरों की तरह...!! जैसे रूह छूटती है, जब जिस्म की क़ैद से नदी के दोनों किनारो का दायरा तोड़ कर .. जा मिलेंगे समंदर में.. उस लम्हा, हाँ उस लम्हे में.. हम इंसान सब एक हो जाएंगे...!! जात, धर्म, पंथ, वर्ण, रंग, पद, लिंग व जिस्मों के दायरे तोड़कर.. दो रूहें मिलेगी ...!! इस विशाल भूमिपर केवल इंसान बनकर..!! इंसानी रूह में.. इंसानी खाल में...!! - वृषाली सानप काले