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Showing posts from September, 2018

साईं बाबा कृपा करना

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राम नाम से पत्थर भी तर जाते है समन्दर में , साईं राम नाम से संसार रूपी सागर तर जायेंगे। एक बार साईं राम नाम का रटन करके तो देख , दौडे आयेंगे साईं राम तेरी बिगड़ी बनाने के वास्ते। एक बार पुकार के तो देख बन्दे , साईं नाम आज़मा के तो देख। * * * कौशल्या वाघेला 

ऐ जिंदगी

ऐ जिंदगी तुमने जो भी दिया हमने आँचल में लिया...!! ऐ जिंदगी तुमने जैसा भी दिया हमने वैसा ही लिया..!! ऐ जिंदगी तुझसंग ही जी लिया न कोई शिकवा किया..!! ऐ जिंदगी बस प्रेम ही तो किया बस प्रेम ही तो दिया..!! ऐ जिंदगी तुझ गुलाब की पंखुड़ियां सँझोने में हर पल गया..!! ऐ जिंदगी जन्मो की सौगात को न लिया तेरे दामन में अमृत पी लिया..!! ऐ जिंदगी गर्व तुझपर सदा  है किया सलाम झुककर है किया..! - वृषाली सानप काले

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You do not Have control on the doing You have to control On thinking But ultimately Thinking is based On the information... So be alert about What type of information You should feed up in the brain... Which information Gives you energy...?? Accept the perfect power... - Vrushali Sanap kale

दुवा की ताकत

     जिंदगी बहोत खूबसूरत है। लेकिन उसके अपने कुछ उसूल होते है, जिन्हें जानना तथा समझना अत्यंत जटिल होता है। जीवन अपनी धुन में बहता रहता है। हमे जीवन की रवानी में बहना है। बस ध्यान ये रखे कि ये रवानी किस दिशा एवम उद्दिष्ट को लिए भ रही है..?? ये विचार ही वो संस्कार है जो मनुष्य को मनुष्य तथा देवता एवं शैतान का करार देती है। ये सत्य है कि कोई भी मनुष्य लिखकर नहींं आता क्योंकि वो क्या और कैसे जीवन जियेगा, परन्तु ये बि सत्य है कि मनुष्य ही अपने कार्मिक एकाउंट के द्वारा अपनी प्रालब्ध तथा अपनी संचित जीवन की स्थिति स्वयं बनाता है।    वाचा, कर्म तथा मन के माध्यम से वह कर्म की गुह्यतम गति का शिकार हो जाता है। कोई भी जटिल कर्म भले ही न करे इंसान परन्तु अति छोटे से छोटे कर्म से भी उसका कार्मिक एकाउंट बनाता जाताय है। मनुष्य सबसे अधिक कर्म उसकी मन व वाणी से करता है। मन का हर विचार फिर वो सही हो या गलत जो, सत्य हो या असत्य हो, झूठ हो या सत्य हो, अच्छा हो या बुरा हो, पापी हो या पवित्र हो वो सत्य में कार्य कर जाताय है...!! जिस सत्य को इंसान नहींं जानता, यही से उसका...

रिश्ता (संवादात्मक कथा)

"कैसी हो राधिका..?" "ठीक हुँँ..?" "खुश हो..?" "शायद खुश भी..?" "शायद नहींं, यकीन से बोलो...?" "आज इतने दिनों बाद हम मिले है, क्या झगड़ने के लिए..?" "अरे झगड़ा नहींं पर ..दोस्त हुंं न तुम्हारा...?" "वो तो हो ही,रहोगे भी.." "उस दिन 2 महीने पहले तुम्हारी फोन पर सुनी आवाज, तुम्हारे साथ तुम्हारे पति ने किया बर्ताव..मारपीट,..वो रोती कलपती आवाज .. कैसे भूल सकता हुंं मैं..?? राधिका...?" "..." "पंख लगाकर आजाऊ ऐसी मेरी अवस्था थी..पर दुख ये था कि उस वक्त मैं तुम्हारे लिए कुछ भी नहींं कर सकता था...केवल तुमने डाली कसम की वजह से..." "तो क्या करे सागर..घर की बात चौराहे पे तो नहींं लायी जाती...?" "हाँँ, बिल्कुल सही मैं तो बाहरवाला हुंं न..?" "अगर ऐसा होता तो ये बात सबसे पहले तुमसे नहींं कहती दोस्त..." "अरे मेरा ये मतलब नहींं था, गलत न समझो.." "तुम तो मेरा सहारा हो, जो बात अपने पति, भाई, बहन, माँँ-बाप से भी नहींं कह सकती वो लाखो बाते ...

क्या है अध्यात्म (भाग - 12) आध्यत्मिकता व व्यवहार

    वास्तव में आध्यत्मिकता की दृष्टि समाज के मन मे न होने से ही समाज आज दुरावस्था का शिकार बन चुका है। आध्यत्मिकता को भय तथा शक की दृष्टि से देखा जाता है। सन्यासी, विरक्त व दूसरे लोक का विषय माना जाता है।    परन्तु आज के जीवन के सुखस्वरूप अवस्था की प्राप्ति का प्रमुख साधन अगर आध्यत्मिकता बन जाती है तो निर्विवाद धरती स्वर्ग बन जाती है।   आध्यत्मिकता के गुणों को धारण कर विजयी बनाना इतना आसान भी नहींं तथा इतना कठिन भी नहींं है। बस जरूरत है सही ज्ञान व सही तरीको की। जिसके द्वारा परिवर्तन के लिए दृढ़ता की अत्यंत जरूरत है। दृढ़ता के बगैर कुछ भी सम्भव नहींं है। अडिगता ही बदलाव की ताकत रखता है।    विचलित करनेवाली तमाम शक्तियां अडिगता के इर्दगिर्द भारी हुई है, जिनका कार्य ही विचलित एवं पराजित करना है। विकारों के कब्जे में लाना है।आध्यत्म के मार्ग को छुड़ाना है। बावजूद इसके इस मार्ग पर चलते रहना ही अडिगता है। इन सभी विचलित बातों से उभरना तो आना ही चाहिए।   स्वभाव व पूर्व जन्म संस्कार के कारण कई बार ये होता है कि टकराव अधिक तीव्र रूप ले ही लेत...

ताक़त

गुरु मेरी शक्ति         गुरु मेरी भक्ति गुरु बिन मिले न        जीवन को मुक्ति..।। गुरु बिन तरे भी         कैसे ये भवनिधि गुरु बिन नाही रे        कोई जीवन विधि...।। गुरु सच्चा पारिस         गुरु के ही वारिस गुरु साँचा मालिक        गुरु ही तो वालिद..।। गुरु मेरा तारक      गुरु मेरा चालक गुरु तेरे साधक     गुरु तेरे उपासक..।। गुरु न तो संकर       बीन जीवन कंकर गुरु एक मंतर       गुरु जीवन तंतर..।। गुरु भाग्यविधाता     गुरु जीवनदाता.. गुरु माता पिता     गुरु सबका त्राता..।। गुरु तेरी कृपा       मेरे सद्गुरु नाथा तेरे चरणों पर     मैं शीश नवाता..।। - वृषाली सानप काळे

कब तक....??

रक्त के कण कण से मन के सुने आंगन से  अब  रिश्तों को संभालते संभालते  थक चुकी हूं...!! खुद के मन दहन की रोज मर्रा की  गतिविधि से थक चुकी हूं...!! तत्पश्चात अपने ही मन को झूठा बहलाने की कठिन सी आंतरिक वकालत से थक चुकी हूं..!! मूल्यों व आदर्शो की  पावन प्रतिमा को आईने के समान चमकाने की सरफरोश तमन्ना से थक चुकी हूं...!! हर पाक व कुर्बान भाव से हर रिश्ता संभालने की  नाकामयाब कोशिश से  थक चुकी हूं..!! स्व मत,परमत, व ईशमत  की पावन बेला में सबको पाक करने के पवित्र प्रयास से थक चुकी हूं...!! ज्ञान,वास्तव,स्वार्थ,व्यवहार ईश्वरीय आज्ञा में सरोबार के बीच संघर्ष की  नित्य लड़ाई से थक चुकी हूं...!! है परमात्मन तू है  इस अटूट विश्वास के सहारे  जीते जीते तेरे ही इंतजार में अब थक चुकी हूं..!! उस आखरी पल के इंतजार में ही रुकी हु...!! बस अविरत रुकी हु...!! - वृषाली सानप काले

नौकरी

योग्यता थी कम कभी वैकेंसी खत्म  बेरोजगारी की पीड़ा में,   आँखे होती नहीं  नम बढ़ते रहे हम, कदम दर कदम  प्रयास की गिनती नहीं हुई है कम अधरों की मुस्कान खोने लगी  उत्साह  में भी कमी होने लगी उज्ज्वल कल में घुट रहा वर्तमान फल की आशा कर दूँ बलिदान...?? - अज्ञात

हिन्दी दिवस 14 सितम्बर 2018

 तेरे जखमो को सिने मे हमने तो छुपाया है तेरे अशको को लहू सा हमने तो पी लिया है...!! 'तेरी पहचान हम नहीं हमारा वजूद है तू 'तेरी अरदास हम नहीं हमारा खातून है तू... सारी दुनिया मे तो हमको तुमने ही जिलाया है...!! ये भोले पगले है जगवाले खरे सोने को धुतकारे ये बुरे होते है फितवाते मिटाते है जो उजियारे... स्व मान का सिक्का तेरी टकसाल मे बनाया है...!! आजादी ये आजादी 'तेरी एहसान सदीयो ही बरबादी न हो जाये 'तेरी न ईबादत होईयो जी.. ऐ हिंदी तू भाषा ना राष्ट्र जननी ही गाया है...!! तेरे कदमो मे सदीयो ही हमने सर झूकाया है...!! वृषाली सानप काळे

क्या है आध्यात्म (भाग -11) प्रारब्ध

इस मनुष्य जीवन मे प्रभु से हमें समय, श्वांस, प्रेम व संकल्पो  की अनमोल संपत्ति मिली है। संपत्ति कभी भी खुद के लिए नहींं होती। उसको हम जितना दुसरो को बाटेंगे उतनी हमारी कमाई अधिक होंगी। इसलिए हम इसका सदुपयोग करेंगे और जिन्हें हमारे समय की अधिक  आवश्यकता होगी उन्हें सदा ही देते रहेंगे। भला जरूरतमंद व्यक्ति कितना भी अज्ञानी या फिर गलत आदते व संस्कारो का आदि हो, वो हमारी भूमिका को समझने की योग्यता नहींं रख सकता। सदैव हमेंं ही समझदार बनना है व प्रेम ही प्रेम देना है...!!   कारण की हमारे कर्म का जो भी रेकॉर्ड बन रहा है, उसमें डिलीट का कोई भी ऑप्शन नहींं है ..!!एक बार रेकॉर्ड हुआ तो बस हुआ...!! फिर उसे डिलीट करने के लिए हर एक को 84 जन्मों तक मेहनत करनी पड़ेगी, तब जाकर ये कड़ी मेहनत से ये रेकॉर्ड नष्ट होगा..!! इसीलिए रिकॉर्ड हो ही रहा है लगातार, बिना रुके तो फिर क्योंं न अच्छाई का ही रिकॉर्ड करे...!! बुराई तथा बुरे कर्मो का रेकॉर्ड क्योंं करे...!! ये रेकॉर्ड हमारा प्रारब्ध बनानेवाला है, तो इसे बड़ी सावधानी व शांति से रेकॉर्ड करना है...!! ये रेकॉर्डिंग करना केवल हमारे ही हाथ मे...

क्या है अध्यात्म (भाग - 10) सम्मोहन

 सम्मोहन एक शक्ति है..!! एक अद्वितीय कला है, जिसकी सहायता से हम हर असम्भव कार्य को संभव कर सकते है।    लेकिन ये सम्मोहन आखिर है क्या..?? मनुष्य तथा अन्य सृष्टि के बीच का लगाव एक सम्मोहन ही तो है। एक दूसरे से प्रेम भी सम्मोहन ही तो है।किसी भी बात की नशा भी तो एक सम्मोहन ही है।  जब भी हमारा मन, हमारी आँखे किसी सुंदर चित्र या वस्तु को देखता है तो स्वतः अपनेआप एकाग्र होता चला जाता है, तथा अनायास उस चीज के प्रति खींचते चले जाते है, यही तो है सम्मोहन..!!     कई बार ये भी तो होता है कि हम जीवन मेंं कोई एक ऐसा पाते है कि केवल उसकी बात हम अनायास सुनते जाते है। जो हमें निरन्तर सुझाव देता चला जाता है, जिसके हम प्रभाव में आ कर अपने आप उसका कहना मानते चले जाते है, बिना किसी दबाव के..!! ये सम्मोहन ही है।     सम्मोहन जीवन के लिए जिंदगी के लिए आवश्यक भी है, परन्तु ये भी आवश्यक है कि हम किस बात के प्रति सम्मोहित हो रहे है...?? अगर हम ज़रा भी किसी व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ वा वैभव, प्रणय कि तरफ़ आकर्षित हो रहे है। तो यह उनकी सम्मोहन शक्ति के कारण ही ...

क्या है अध्यात्म...(भाग-9) सांसारिक जीवन-योगी व योग

 सांसारिक जीवन मे जीवन गुजारना वैसे तो वास्तव में अत्यंत कठिन है,परन्तु असम्भव नही..!!जिसका प्रज्ज्वलित उदाहरण है हमारे सामने-- संत तुकाराम...!! वास्तव में योगी समाज मे रहेगा तभी समाज का परिवर्तन होगा। समाज से परे रहेगा तो सिर्फ योगी का परिवर्तन होगा। परन्तु समाज मे रहकर योगी के योगित्व की हिफाजत के लिए पहले योगी को समाज की तमाम इम्तहानों को पार करना होगा अर्थात केक समस्याओं का मुकाबला करना होगा, तपना होगा योग की अग्नि में, ज्वालामुखी योग की शक्ति बढ़ानी होगी, केवल तभी योगी समाज मे रहकर योगित्व को निभाये समाज का कल्याण की शुभ भावना, संकल्प, सेवा, योग एवं दुवांंये देने योग्य बन सकता है...!!ईश्वर का बन्दा बनकर ईश्वर की इस रचना के सेवा योग्य बन सकता है..!!   समाज तुरन्त नहींं बदलता। समाज की कड़वी, निष्ठुर व्यवहारिकता, निर्दयी वृत्ति, स्वार्थ परायणता एवं अमानवीयता को बदलना तो है, लेकिन पहले ये सब योगी पर ही आक्रमण करेंगे। उसवक्त सदैव ईश्वरिय शक्ति से जुड़े रहो। सदा निश्चिन्त रहो। आप हर बात में हाँ-जी, हाँ-जी करते रहो। स्वयं भी हल्के रहो और सर्व को हल्का रखो। किसी भी हालत मे...

क्या है अध्यात्म?? राजयोग ..."मैं "?? (भाग - 8)

आज समस्त सृष्टि में यही जीवन धारणा चिरन्तन हो चुकी है कि शरीर ही जीवन है, शरीर ही पहचान है, शरीर ही चेतन सत्ता है, शरीर ही सब कुछ है...!! परन्तु वास्तव में शरीर केवल साधन है, सृष्टि के जीवन की अनुभूति का। शरीर एक ऐसा साधन है, जिसके माध्यम से चेतन सत्ता कार्य करती है। जिसे हम "मैं" के रूप में जानते है।    यह मैं हर दृष्टि से परे है। जिसे कोई भी देख नहींं सकता। जिसे किसी भी तरीके से दृश्य प्रमाण में नहींं लाया जाता।   जैसे - सुख, आनंद, शांति, प्रेम, ईश्वर ये अनुभूति की शक्तियां है, किसी भी प्रमाण एवं दृश्यता की नहींं, उसी तरह से यह "मैं" भी उस चेतन सत्ता का नाम व रूप है, जो दृश्य नही लेकिन अलौकिक एवं शाश्वत सत्य है, जिसे "आत्मा" कहते है...!! वास्तव में यह ‘मैं’ शब्द शरीर से भिन्न चेतन सत्ता ‘आत्मा’ है। मनुष्य अर्थात देह रूपी (जीवात्मा) आत्मा और शरीर को मिलाकर बनता है। शरीर पाँच तत्वों से (जल, वायु, अग्नि, आकाश, और पृथ्वी) से बना हुआ होता है। आत्मा मन, बुद्धि और संस्कारमय तथा युक्त होती है। आत्मा में ही विचार करने और निर्णय करने की शक्ति होती ह...

क्या है अध्यात्म..? (भाग 7) राजयोग

  राजयोग याने अपने समस्त इंद्रियों को वश में करना। अर्थात आज जिन इंद्रियों का मनुष्य गुलाम बन चुका है, उनपर राज्य करना याने राजयोग।राजयोग इंद्रियों पर अंकुश रखना सिखाता है।इंद्रियों निर्मित व प्राप्त समस्त पीड़ित जीवन को सुधारता है। राजयोग आसुरी गुणों को नष्ट करता है। राजयोग सात्विक शक्तियों को बढ़ाता है। राजयोग कुकर्मो से लड़ना सिखाता है। मौन की समस्त शक्तियो को उजागर करता है। मनुष्य की खोई हुई सुंदर प्रवृत्तियों को विकसित करता है।राजयोग राजयोग ' ढाई आखर प्रेम' की शक्ति को बढ़ाता है।राजयोग प्रेम से विश्व को जीतने की ताकत दिलाता है। राजयोग इंसान को देवता बनाता है।राजयोग इंसान की रूह को  इंसान की रूह से मिलाता है।राजयोग रूहानी रिश्ते जोड़ता है।राजयोग रूहानी ताकत का दर्शन कराता है।राजयोग रूह के द्वारा रूह की रूहानी सेवा, रूहानी मुक्ति, रूहानी प्रेम, रूहानी माफी की शक्ति सिखाता है। सिखाता भी है व उपयोग में ले आता है। राजयोग रूहों के द्वारा रूहों को शांति दिलाकर शांति का राज्य प्रस्थापित करता है। राजयोग सुख, समाधान, शांति, प्रेम, आनंद व सत्य इन शाश्वत मूल्यों की स्थापना करता है, जो ...

क्या है अध्यात्म..?? (भाग - 6)

आत्मा-राजयोग के लिए पात्रता तथा कर्म, आहार का शाश्वत ज्ञान *********************    मनुष्य ने सदैव अपने स्वार्थ की दृष्टि से ज्ञान को मरोड़ा है, जब जैसे हो सके उसे बदल दिया है।परंतु जो शाश्वत होता है उसे कोई भी बदल नही  सकता। ईंश्वर, ज्ञान, सत्य, आनंद, प्रेम, विश्वास, जन्म एवं मृत्यु ये सभी चिरंतन एवं  सत्य ज्ञान है।       धर्म अर्थात वह सत्य ज्ञान जिसे धारण किया जाए। वह कृत्य जिसका अनुकरण धारणा के द्वारा संस्कारित हो जाये। धर्म जिसका सार, उद्दीस्ट केवल मनुष्यता है। माँँ का बेटे के प्रति कर्तव्य याने उसका धर्म-- मातृ धर्म , बाप का बेटे के प्रति कर्तव्य याने उसका धर्म-- पितृ धर्म , बच्चो का माँँ--बाप के प्रति कर्तव्य याने उनका धर्म-- पुत्र धर्म , अध्यापको का धर्म-- गुरुधर्म , छात्रों का कर्तव्य याने उनका धर्म-- छात्र धर्म , राज नेताओ का जनता के प्रति कर्तव्य याने उनका धर्म-- राजधर्म , चिंतक का चिंतन के प्रति कर्तव्य याने उसका धर्म-- चिंतक धर्म , वक्ता का श्रोताओं के प्रति कर्तव्य याने उनका धर्म-- वक्ता धर्म ...!! आदि सभी सच्चे धर्म है। ...

क्या है अध्यात्म..?? आत्मा (योग (राजयोग) भाग--5

 अपने जन्म जन्म के संस्कार से ही वह सदैव कर्म करती है। इन कर्मो से ही मनुष्यो का जीवन चल रहा है। इन कर्मो के संस्कारों में परिवर्तन होता रहता है। वह परिवर्तन परिस्थिति, संस्कार तथा बुद्धी व ज्ञान के आधार पर होता है। मनुष्य जैसा कर्म करता है वैसा उसका धर्म होता है। वास्तव में उसका कर्म ही उसका धर्म है। उसके क्रम के आधार से युक्त भूमिका ही उसका धर्म है।आज वास्तव में इसी भूमिका से लोग अनभिज्ञ होने की वजह से ही सृष्टि पर अराजकता तथा अशांति का माहौल बढ़ गया है। मुझे जो चाहे मैं करु ये प्रवृत्ति ही संस्कार तथा धर्म मे परिणत हो चुकी है। स्वतंत्रता का अर्थ हर एक नए स्वार्थानुसार स्वैराचार लगा लिया है। इसी के समान कई सारे चिरन्तन एवं शाश्वत शब्दो का अर्थ मनुष्य ने नीति को छोड़कर स्वमतानुसार स्वीकार लिया है। यही तो वो गफलत है जिसने मनुष्य को अंधकार की गहरी खाई में सदियो से धकेल दिया है।    जब कोई भी मनुष्य आत्मा अपना धर्म अर्थात कर्म, संस्कार, गुण को परिवर्तित कर लेती है तो उसे विकृत या विकारी कहते हैं। अतः विकार याने परिवर्तन। धर्म, स्वरूप या गुण परिवर्तन का नाम ही विक...

कृष्णा (जन्माष्टमी के अवसर पर)

बनी मैं तेरी मुरली मुरारी प्रीत में तेरी दुनिया हारी कृष्ण कन्हैया तुमपे वारी... तुझसे ही प्रीत तू ही है मीत जीवन का सफल तू संगीत चारो धर्म को तू ही सवारी.. कृष्ण कन्हैया तुमपे वारी... नेति नेति इति की सद्बुद्धि सिखाये माया की अवरुद्धि निवाले में दी माखन की क्यारी.. कृष्ण कन्हैया तुमपे वारी... जीव जगत की सृष्टि माया रूहको तुने रूहसे मिलाया जिस्मानी डोर तोड़ी सारी.. कृष्णकन्हैया तुमपे वारी..! अब अपना लो तुम ये चेरी सुन लो विरह की ये भेरी भस्म कर दो हदे ये सारी... कृष्ण कन्हैया तुमपे वारी..! कान्हा न जाने प्रीत न जाने अद्वैत प्रेमको जगत न माने ओ ज्योतिर्मय प्रेम मुरारी कृष्ण कन्हैया तुमपे वारी...!! - वृषाली सानप काले

क्या है अध्यात्म..?? (भाग ४) "आत्मा एवं मौन"

आत्मा की अष्ट शक्तियां ही उसकी पहचान है।सहनशक्ति, समाने की शक्ति, परखने की शक्ति, निर्णय की शक्ति, सहयोग की शक्ति, सामना करने की शक्ति, विस्तार से संकीर्ण करने की शक्ति तथा समेटने की शक्ति ये शक्तियां ही आत्मा को सर्व शक्तिमान बनाती है। इनका विकास व मजबूती ही आत्मा की परिचायक है। जिनमेंं से एक भी शक्ति अगर कमजोर हो जाये तो आत्मा को समस्याओं का सामना करना पड़ता है तथा उनमें से बाहर निकलने में अड़चनें आ जाती है। इन  शक्तियों की उपासक आत्मा जीवन मे कभी भी हार नहींं जाती तथा विध्वंसक नहींं बन सकती। इन शक्तियों की उपासक आत्मा सदैव सत्य व ईश्वर के समीप होती है। इनके साथ साथ आत्मा के कुछ विशेष गुण भी होते है। जो उसे परिपक्व बना देते है। जो इन शक्तियों के साथ मोल जाए तथा साधना से जुड़ जाए तो आत्मा को देवी शक्तियों की प्राप्ति से कोई भी पीछे नहींं खींच सकता। प्रेम, शांति, ज्ञान, पवित्रता, आनंद, सुख व शक्ति ये गुण समय व कर्म अनुसार प्रालब्ध अनुसार विद्यमान होते हुए भी लुप्त हो जाते है। उन्हें परखना, संवारना, संजोना, निखारना व विकसित करना ये आत्मा का प्रथम कर्तव्य है। क्योँकि आत्मा तो स्वय...

क्या है अध्यात्म..??(भाग3)

*********************    आत्मा अपने आप मे बेहद मजबूत होती है ,परन्तु उसके कर्म के परिणाम स्वरूप वह धक्का खाते फिरती है।कोई भी आत्मा किसी भी परिवार में किसी एक के साथ के हिसाब के लिए भी आती है ,तो कभी कभी हर एक सदस्य के हिसाब के लिए भी आती है।    आत्मा का हिसाब प्रेम का भी होता है तथा बैर,वैमनस्य,दुश्मनी,पद, सत्ता,व्यापार,पैसा तथा जायदाद का भी होता है।    हर एक भाव व घटना जो भी हर आत्मा के साथ घटती है ,वह अगर उसे दुखाकर या सुखाकर गयी है तो वह उसके खाते में जमा हो जाती है उसके अगले जन्म के लिए।     कभी कभी ज्ञानी आत्मा को कई तरह के दुख--दर्द का सामना भी करना पड़ता है,क्योँकि वह ज्ञानयुक्त आत्मा हिसाब चुक्तु करती जाते वक्त कई आत्मा उनकी वृत्ति व प्रवृत्ति के अनुसार उस पवित्र आत्मा के अच्छे संस्कारो का ग़लत इश्तेमाल करती है,जिसके कारण वश उस पाक आत्मा को तकलीफ युक्त जीवन का सामना करना पड़ता है।ऐसे समय मे कई लोग सत्य के प्रति अविश्वास व्यक्त करते है,परन्तु यह तो उस पवित्र आत्मा के भविष्य में होनेवाले देवता स्वरूप की बुनियाद बन रही होती है।यह हिसाब नही...

क्या है आध्यात्म..?(भाग२) "आत्मा"

*********************     आत्मा *********************    आत्मा व प्रकृति इन्ही से ये जगत है।इस जगत का अनोखा स्वरूप आत्मा से ही जीवित है।आत्मा वास्तव में है क्या..?? ये जो जीवन जी रहा शरीर है,ये जो शरीर जिसकी अन्न,वस्त्र,निवारा ,हवा पानी ,सुख,शांति,पैसा ये जरूरते पूरी करने के लिए मनुष्य सारा जीवन व्यतीत कर रहा है,उस शरीर का।   एक मालिक--अर्थात आत्मा..!!   आत्मा एक चेतन शक्ति है।जो समस्त जगत में सर्व श्रेष्ठ है।आत्मा की अपनी कुछ शक्तियां है।वह जब शरीर रूपी वस्त्र में प्रवेश करता है तब उन शक्तियों को लेकर आता है,तथा जब इस वस्त्र का त्याग करता है ,तब उन समस्त शक्तियों को लेकर भी जाता है।     मन ,बुद्धि,व संस्कार ये तीन आत्मा की प्रमुख शक्तियां है।ये शक्तियां आत्मा के साथ आती है ,तथा साथ ही जाती है।मन व बुद्धि की अनुभूतियां एवम ज्ञान से आत्मा पर संस्कार होते है।इन संस्कारों के प्रभाव में ही आत्मा हर कर्म करता है।ये कर्म संस्कार हर जन्म में आत्मा के संग संग चलते है।हर जन्म के क्रम संस्कारो के फल भी आत्मा लेती एवं देती है।     आत्म...

क्या है आध्यात्म.(भाग--१) "आत्मा"

********************* आत्मा ********************     ईश्वर की बनाई हुई इस सुंदर रचना की एक अनुपम कलाकृति अगर कोई है ,तो वो है "आत्मा.."!!      आत्मा अपने आप मे केक सद्गुणों की खान है।ईश्वरीय गुणों से युक्त है,परन्तु अपने अनेक कर्म,कुकर्म,सुकर्म,सत्कर्म,पापकर्म आदि के चक्रव्यूह में फंसकर वो अपनी तमाम गुणों को खो चुकी है।अनेक दुष्कर्मो की वजह से दुर्गुणों की खान बन चुकी है।     आत्मा व ईश्वर ये दोनों भी अति गुह्यतम विषय है।जिनके बारे में न कोई जानता है न कोई इस विषय पर बात करना पसंद करता है।परन्तु बावजूद इसके इस विषय की सही जानकारी हर एक को होना समय की मांग है,कारण की जिस देह की तमाम जरूरतों के पीछे मनुष्य पागलो की तरह भागे जा रहा है ,उस देह में स्थित आत्मा की पहचान हमे होना अत्यंत जरूरी है।     आत्मा के ज्ञान का अध्यन जिस शास्त्र में किया जाता है ,वह है ,"आध्यात्म"!इस अध्ययन की शाखा को ही ज्ञान उपासको ने अभ्यास प्रणाली से हटा दिया है।अभ्यास से जुड़ी केवल दो शाखाएं रखी है--आधी भौतिक एवं आधी दैहिक ...!!एक मे समस्त सृष्टि का तो एक मे समस्त ...

आध्यत्मिकता व राखी

राखी भारत वर्ष का एक अनोखा त्योहार है।राखी  केवल भारत की धरोहर तथा संपत्ति है।राखी अपने अंदर भारत के गहरे इतिहास व सत्य को लिए हुवे है। भारत मे राखी केवल बहन ही भाई को बांधती है यह प्रचलित परम्परा है। परन्तु वास्तव में यह एक ईश्वरीय अलौकिक बन्धन की सच्चाई लिए हुवे है।जिसे कोई भी नही जानता। कुछ ऐसे ही सत्य व शास्वत विचार बतलाना मुझे जरूरी लग रहा है।    सृष्टि के निर्माण,विनाश की प्रक्रिया का नियंत्रक वह है जो विश्व निर्माता है।जिसे हम परम् पिता परमात्मा कहते है।जो इस सृष्टि के अनंत आत्माओं का पिता है।इसलिए हमारा बाप है।जो समय,कर्म,न्याय,संस्कार के प्रति अत्यंत सतर्क है। उसकी नियमावली के अनुसार इस सृष्टि के एक संपूर्ण आवर्तन को पूरा होने के लिए 5000 वर्ष का समय लगता है।जिसे एक कल्प कहते है।ऐसे केक कल्प आज से पहले हो चुके है।जब ऐसे एक कल्प की पूर्णता व नए कल्प की सुरुवात होने से पहले इस सृष्टि पर परमपिता परमात्मा का आगमन होता है।    5000 वर्ष को साधारणतः 4 युगों में विभाजित किया गया है।एक युग 1250 वर्ष का है।सत्य युग,त्रेता युग,द्वापर युग,व कलियुग ये चारों य...

क्या चाहते हो तुम

मुझे चाहकर मुझे देखकर क्या पाते हो तुम जरा मुझे बोलो..!! पल पल मेरा इंतजार कर मेरे लिए दुवाए भी माँगकर.. क्या पाते हो तुम जरा मुझे बोलो.. हर अदा में सजदे करकर बदले में तुम तो आहे पाकर.. क्या पाते हो तुम जरा मुझे बोलो..!! तौहीने वफ़ा मुझपे लुटाकर अश्को की माला मेरी अपनाकर क्या पाते हो तुम जरा मुझे बोलो..!! चाहसे इकरार भी ना मंजूर फिर भी उल्फते जफ़ा मगरूर क्या पाते हो तुम जरा मुझे बोलो तेरी चाहते से अब हमे लागे डर तेरी वफाये इश्क से हारकर इकरार कर न जाए थककर ... यही चाहते हो तुम ना मुझे बोलो..!! - वृषाली सानप काळे

दायरे

अम्बर के नीचे धरती के तले,  कुछ दायरे हम ही तय कर लेते हैं.. जीवन की चकाचौध की, रंगीन सियासतें हम ही तय कर लेते है... दायरा... दायरों में कहाँ होती है बंदिस्त... नदी, सागर, अग्नि, आकाश, पानी, हवा तथा सरफरोश तमन्ना...!! वो..वो तो बेहद, बेख़ौफ़ बहते है... चलते है निले आसमा के तले, कभी भी न रुकने के लिए...!! दायरे न जड़े मानती है न शाखे, ना ही बेजुबान के जुबान की बाते... दायरे तो सीमाएं आँखते है.. गली, समाज, न्याय, पद, प्रतिष्ठा, कौम, नीति एवं इंसान की..अनायास इंसानियत की...!! भाटे के समय बढ़ते पानी के समान आओ तोड़ दो..ये दायरे नदी के दो सिरों की तरह...!! जैसे रूह छूटती है, जब जिस्म की क़ैद से नदी के दोनों किनारो का दायरा तोड़ कर .. जा मिलेंगे समंदर में.. उस लम्हा, हाँ उस लम्हे में.. हम इंसान सब एक हो जाएंगे...!! जात, धर्म, पंथ, वर्ण, रंग, पद, लिंग व जिस्मों के दायरे तोड़कर.. दो रूहें मिलेगी ...!! इस विशाल भूमिपर केवल इंसान बनकर..!! इंसानी रूह में.. इंसानी खाल में...!! -  वृषाली सानप काले

समेट ले...सिमट ले...

अब भी क्या बाकी है सिमटना..?? कितना सिमटे. कितना समेटले...?? कायनात की उल्फत तथा ताकत की भी लौ.. शायद भस्म ही नही तो राख के कण कण से भी अस्तित्व विहीन हो गयी है...!! समंदर की सुनामी तथा नदियों के बाढ़ का जल भी जब सूखकर निशान विहीन सा अवसाद ढूंढता रहे .. पर हासिल कुछ न हो...!! तब भी जब कोई कहे.. सिमट लो ... समेट लो...!! तो मन का लाव्हा उद्विग्नता से आक्रोश ही करे... रेत पे निशान भी नही छोड़े हमने सहन शील सिमट के... कदमो के...!! वाह रे जमाने... फिर भी कहे...सिमट ले..समेट ले...!! - वृषाली सानप काले

मिसाल बने

इंसान पूरी जिंदगी बस दुसरो का अनुकरण व भाव ही पढ़ने का प्रयास करता रहता है।क्यो उसकी अपनी जिन्धी दुसरो की सलाह व विचार पर आश्रत हो जाती है..??    दूसरा व दूसरे ...इस परिभाषा से बाहर आने की बहोत जरूरत है...!!क्योँकि किसी भी चीज के लिए किसी का उदाहरण देना बहुत सरल है लेकिन किसी के लिए खुद उदाहरण बनना बहुत ही मुश्किल है..!!इसीलिए जीवन मे उदाहरण नाही दो खुद उदाहरण बन जाओ..!!      दुसरो की तस्बीरों के आगे तो सब झुकते भी है व पूजते भी है,आओ कुछ ऐसा करे कि लोग हमारी तसबीर को भी महान मानने लगे..!!     लोगो को सब टालते है,जब उनकी मौजूदगी उन्हें तकलीफ देने लगे।हम ऐसे बने की लोगो को हमारी मौजूदगी से शक्ति महसूस हो...!!    सदियों से यही तो चाह हम रखते आये की हमे ये मील हमे वो मील,हमारी किस्मत ऐसी हो,हमारे भाग्य में वो हो ।हम भाग्यशाली बने..!!अपने भाग्य में किसीसे कुछ उम्मीद रखने के बजाय अगर हम ही दूसरों का भाग्य बना  देंगे तो...!!क्योँकि भाग्यशाली वे लोग कभी  नही होते है जिन्हें सबकुछ अच्छा मिलता है बल्कि भाग्यशाली तो वो होते ह...

मौत फरिश्ता है

मौत से नाही ना डरो मौत सुकून है देती... मौत से यारी कर लो मौत जिंदगी है देती... मौत रहमत है होती मौत सहमत है होती मौत अमानत है होती साँसों की जमानत है होती... मौत फरिश्ता है सही मौत ने सत्य ही कही कठोरता से ही सही जो भी बाते है कही.. मौत जमीर है होती मौत जागीरे है देती मौत लकीरे है होती मौत तकदीरें है देती.. मौत गर मौत न होती नई जिंदगी कैसे होती मौत आत्मा को अन्ति परमात्मा से है मिलाती...!! - वृषाली सानप काले

निराकारी ईदी

कभी भी चाँद बन मुसकाया कभी अमावस में भी पाया कभी मस्जिद काही बनाया खुदा की खुदाई बाँटता गया पर न खुदाको समझ पाया..!! बाढ़ में भी हलके से छाया तूफान में भी छुप मुस्काया तमाशा वो देखता ही गया फिर भी सब बचाता गया.. पर न खुदा को.....!! सुनामी भी हो फिर कुनामी खुदाई की भी हो बदनामी नही बेईमानी को दी रहमी.. गणपती संग दी ईद की नमी पर न खुदा... निराकार ईश्वरत्व की प्रभा समझाता गया कर्म की आभा नमन हो या नमाज़ की अदा करो रुदय से बस सजदा जानोगे तब ही राम तथा अल्ला..!! दिवाली, होली का प्यार न्यारा कड़वा चौथ ईद ऐसे ही प्यारा तोड़ो न बाँटो भाव ये गहरा आपदाएं देती है तभी पहरा.. निराकार का ये स्वरूप न्यारा..!! ईद प्रतिरूप है वो ही प्यारा...!! -- वृषा सानप काले

अभागे धागे

रिश्तों को जोड़ने से अब डर लागे रिश्तों को जोड़ने से अब मन भागे। रिश्तों की महफ़िल के हम अभागे रिश्तों की ताबीर से क्यों न जागे..!! रिश्तों की दुनिया झुके दौलत के आगे रिश्तों की वादियाँ सौखे शोहोरत के धागे..!! रिश्तों की डायन बस तावीज सी लागे.. रिश्तों की गायन बस झूठन सी मांगे..!! रिश्तों से बदनाम है भावो के धागे रिश्तों पे भरोसे कभी ना करना अभागे..!! -- वृषाली सानप काळे

उधार दे

मुझपर एक एहसान तू ही कर दे ज़रा.. जिंदगी दर्द ही उधार सा दे दे जरा..!! साहिल की दिशाओ का नही ऐ तबार यहाँ.. काँच के फर्श पर ही चला दे ज़रा..!! शहजादी जिंदगी के तो झमेले हजार है.. तनहाई के तूफ़ान की करवटें बदल दे जरा..!! समतल बना ये जीवन लगता है बोझल सा.. गुस्ताखे गमे आवाज ही तू सुनादे जरा..!! खुशियो का न रहता है पहरा मेरी देहलीज पर.. संवेदना का ताज मुझे पहना दे ज़रा..!! प्यास बुझती ही नही रे खुशियो को पिने से.. तेरी मधुशाला में अब गमकी पिला दे हाला जरा..!! है इकरार गमे इश्क का नही जाता नशा.. दर्द का कर्जा ही अब बढ़ा दे जरा..!! - वृषाली सानप काळे

संवादात्मक कथा - "मूल्य"

   "कई बार इस नम्बर से कॉल आ रहा है..? आखिर किसका हो सकता है...? गलत व्यक्ति का तो नही होगा...? चलो उठा ही लेती हूं...!" "हैलो.. कौन..?" "दीपक श्रीवास्तव...बोल रहा हूं, पूजा...जानती हो मुझे...?" "....जी..." "शुक्र है पहचान तो लिया..." "कैसे हो आप सब...?" "..खुश तो सब है री, पर ये बता तू फोन क्योंं नहींं करती...?" "आप लोग भी कहाँ करते हो भाई...?" "पर तु क्योंं नहींं करती..? जो भी कुछ भड़ास हो तुम्हारे मन मे वो बोल दो मुझसे, कुछ भी मन मेंं न रख खुल के बोल, इसके बाद तुमने बात भी नहींं की तो भी मैं तुमसे नाराज नही रहूंगा। तुम्हारी खामोशी दिल को चीर जाती है..लाखो ख़ंजर ख़ौप देती है।" "..कुछ नही भाई, सब ठीक है यहां..." "कुछ ठीक नहींं है, तू तड़प रही है मैंने भाई होकर महसूस नहींं किया पर तुम्हारी भाभी ने महसूस किया है। तुम दर्द पीती रही हो आजतक आज तुम्हे बताना होगा मुझे, बोल भी दो बहना..." "भाई दिल दुखेगा आपका .." "दुख जाने दो, मुझे सम्भालनेवाला ...

रूहानी सेवा

 परमपिता परमात्मा एक निराकार शक्ति है। उसी निराकार ज्योतिर्मय स्वरूप का एक निराकार बिंदु स्वरूप अंश याने "आत्मा"....!!     आत्मा भी उन सभी गुणों से युक्त होती है, जिन गुण रूपी शक्तियों से हम निराकार ईंश्वर की उपासना करते है। तथापि जब आत्मा पंचतत्व  रूपो से युक्त देह के सम्बंध में आती है, तब देह अर्थात पंचतत्त्व की प्रभावात्मकता से भटक जाती है अपनी वास्तविक पहचान से...!!     आत्मा की अपनी कई शक्तियां होती है। आत्मा की विचार करने की शक्ति याने मन. ..,उसकी निर्णय करने की शक्ति याने बुद्धी .., उसकी देह के द्वारा कार्य करने की योग्यता याने कर्म ...,तथा कर्म करने की पद्धति एवं गुणात्मकता के द्वारा होता कर्म का दृढ़ीकरण याने आत्मा के संस्कार ...!!एक देह छोड़े दूसरे देह को धारण करने के पश्चात भी आत्मा की ये मन, बुद्धी एवं संस्कार सदैव उसके साथ रहते है, जिससे ही उसको कर्म भोग एवं प्रारब्ध को भुगतना पड़ता है।    आत्मा का स्थान मनुष्य की दोनों भृकुटियों के बीच मे होता है। आत्मा जब भी नया देह धारण करती है तब अपने साथ में बोलना, देखना, सुनना, संवेदना...