Posts

Showing posts from August, 2019

कृष्ण

भारत एक महान देश के साथ साथ अद्वितीय इतिहास की संपदा से युक्त अलौकिक राष्ट्र है। सोने की चिड़िया है..!! ईश्वर का प्रिय देश है..!! अनुपम, महत्तम, श्रेष्ठतम, उच्चतम है..!!   भारत की साहित्यिक संपदा ही भारत की सही परिचायक है..!! भारत को विश्व के सामने चिरस्थापित करने में जिसका अविभाज्य भूमिका है..!!    लेकिन ऐसा होते हुवे भी, बावजूद इस गरिमा के, यह भी एक कटु सत्य है कि, भारत की अत्यंत गरिमायुक्त सत्य ज्ञान को मिथक ने नष्ट कर दिया है..!!  जी हाँ, मिथक ही वह है जो हमे सत्य से बहोत दूर तक ले गया है। हमने कभी भी मिथक की जड़े ढूंढने व जानने की कोशिश नही की, बस आंख बंद कर उसे सत्य के रूप में स्वीकार किया, बिना किसी शिकायत व आशंका को उठाये...!! क्यों..?? क्योँकि उन बातों का सम्बंध केवल लोगो की धार्मिक व भावनिक जज्बातों से होने के कारण कोई भी व्यक्ति सत्य को प्रत्यक्ष रखने व जानने की कोशिश से दूर होते ही रहे.. कभी भी नजदीक नही आये...!!   मिथक की सुरुवात उन दो महान व श्रेष्ठ महाकाव्यों से ही हो जाती है,जिनके ऊपर ही समूची साहित्यिक संस्कृति, सामाजिक, धार्मिक,...

जन्मदिन

जन्मदिन... अर्थात जन्म का दिन..!! हर एक के लिए यह दिन महत्ववपूर्ण होता है, परन्तु क्यो..?? जन्म लेकर हम इस सृष्टि रंगमंच पर अपनी भूमिका निभाने आते है, यह अत्यंत आनंद व खुशी की बात है। तथापि हर साल जन्म दिन क्यो मनाया जाता है..?? हर साल की बढोउती का तो यही अर्थ निकलता है, कि हमारी जिंदगी का एक साल गुजर गया..!! एक एक करते कितनी सारी जिंदगी हम गुजार देते है...!! कभी तो पीछे मुड़कर देखना चाहिए कि -  आजतक की जिंदगी हमने कैसे गुजारी...??  कितनो की जिंदगी सुधारी..??  कितनो की जिंदगी बिगाड़ी..??  कितनी आंखे पानी से भर दी..??  कितनी आंखों का पानी पिया..??  कितनो की दवा ली..??  कितनो की बद दुवा ली..??  कितनो को दुवा दी..??  कितनो को बद दुवा दी...??  कितने पल सफल बनायें..??  कितने पल बेकार गवाए..??  कितने मूल्य संस्कार स्वीकार लिए..धारण किये..??  कितने संस्कार नष्ट किये..??  इन सबका लेखा जोखा करने का पल याने निश्चित जन्मदिन...!! अगर इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है... तो बहोत बढ़िया...!! परन्तु एक भी ना ह...

प्राप्ति

जिंदगी का नाम रखे तो क्या रखे .  ?? ये भी एक अनूठा सवाल है.. क्योँकि दुनिया के दस्तूर है अजीबो गरीब सब इसमें मशगूल है...!! फिर भी यहां यही दौर है प्राप्ति क्या यही छोर है.. इसी चकाचौध में मुझे क्या मिला .. पता नहीं मुझे ..!! इंसा इंसा की हकीकत है किसी की दो वक्त की रोटी, तो किसी की चाय की प्याली, तो किसी की हप्ते की पैकेट मनी, तो किसी की साड़ी वो भी मेहँगी... यही तो रोजाना की उपलब्धि है। किसी को नाम, किसी को दाम, किसी को धाम.. किसी को राम की दिल्लगी है। इन सबमे मैं कहाँ हूँ.. मैं सबकी सुनता हूं मैं सबकी बुनता हूँ.. मैं सबकी चुनता हूँ.. मैं सबकी लिखता हूं मैं दर्द से चीखता हूँ.. ये जो मैं होता हूँ उनका भरोसा होता हूँ.. ये जो मैं रोता हूँ उनका पलिता धोता हूँ.. ये जो मैं होता हूँ यही तो मैं पाता हूँ...!! मेरे द्वार होते है खुले सदा घर के भी व मन के भी झूले.. किसी की भी बात सुननेवाले हर समय प्रस्तुत रहनेवाले.. शिकायती जग के आंगन में  हौले हौले प्रीत का मरहम लगानेवाले.. हर किसी की आस व प्यास ...

शिकायत नही है

मुझे शिकायत नहीं  है अपनी सिसकियों से ... ना ही अपनी आहो से.. मुझे शिकवा नही है अपने व्यक्त-अव्यक्त रिश्तों से .. ना ही अपने रिश्तेदारों से.. मुझे गीला भी नही है अपने दर्द से लथपथ अतीत से.. ना ही अपने दर्द के दाता ओ से.. मुझे रुसवाई नही है अपने मासूम सपनो से.. ना ही संघर्ष रत इरादों से... मुझे नाराजी नही है अपने न समझे अनुभवों से.. ना कभी भी कहे न कहे जज्बातों से.. तभी तो आज... मुझे दिललगी हुई न दुनिया से.. न शिकायत जिंदगी से... ना ही कभी मौत से...!! **** - वृषाली सानप काले