निराकारी ईदी
कभी भी चाँद बन मुसकाया
कभी अमावस में भी पाया
कभी मस्जिद काही बनाया
खुदा की खुदाई बाँटता गया
पर न खुदाको समझ पाया..!!
बाढ़ में भी हलके से छाया
तूफान में भी छुप मुस्काया
तमाशा वो देखता ही गया
फिर भी सब बचाता गया..
पर न खुदा को.....!!
सुनामी भी हो फिर कुनामी
खुदाई की भी हो बदनामी
नही बेईमानी को दी रहमी..
गणपती संग दी ईद की नमी
पर न खुदा...
निराकार ईश्वरत्व की प्रभा
समझाता गया कर्म की आभा
नमन हो या नमाज़ की अदा
करो रुदय से बस सजदा
जानोगे तब ही राम तथा अल्ला..!!
दिवाली, होली का प्यार न्यारा
कड़वा चौथ ईद ऐसे ही प्यारा
तोड़ो न बाँटो भाव ये गहरा
आपदाएं देती है तभी पहरा..
निराकार का ये स्वरूप न्यारा..!!
ईद प्रतिरूप है वो ही प्यारा...!!
-- वृषा सानप काले
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