क्या है अध्यात्म..??(भाग3)
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आत्मा अपने आप मे बेहद मजबूत होती है ,परन्तु उसके कर्म के परिणाम स्वरूप वह धक्का खाते फिरती है।कोई भी आत्मा किसी भी परिवार में किसी एक के साथ के हिसाब के लिए भी आती है ,तो कभी कभी हर एक सदस्य के हिसाब के लिए भी आती है।
आत्मा का हिसाब प्रेम का भी होता है तथा बैर,वैमनस्य,दुश्मनी,पद, सत्ता,व्यापार,पैसा तथा जायदाद का भी होता है।
हर एक भाव व घटना जो भी हर आत्मा के साथ घटती है ,वह अगर उसे दुखाकर या सुखाकर गयी है तो वह उसके खाते में जमा हो जाती है उसके अगले जन्म के लिए।
कभी कभी ज्ञानी आत्मा को कई तरह के दुख--दर्द का सामना भी करना पड़ता है,क्योँकि वह ज्ञानयुक्त आत्मा हिसाब चुक्तु करती जाते वक्त कई आत्मा उनकी वृत्ति व प्रवृत्ति के अनुसार उस पवित्र आत्मा के अच्छे संस्कारो का ग़लत इश्तेमाल करती है,जिसके कारण वश उस पाक आत्मा को तकलीफ युक्त जीवन का सामना करना पड़ता है।ऐसे समय मे कई लोग सत्य के प्रति अविश्वास व्यक्त करते है,परन्तु यह तो उस पवित्र आत्मा के भविष्य में होनेवाले देवता स्वरूप की बुनियाद बन रही होती है।यह हिसाब नही होता,यह प्रसंग तो निर्माण की परिक्षक होती है।
आत्मा स्वयं में योग्यता युक्त होते हुवे भी उसे सदैव इस सृस्टि चक्र कि पूरी परिक्रमा के लिए ईश्वरीय शक्ति से जुड़े रहना आवश्यक होता है।आत्मा के कर्म की गुह्यतम गति एवं उसकी क्रियात्मकता ही तथा उसके परिणाम से ही आत्मा उसके प्रालब्ध की निर्मिति करती है।
आत्मा जो भी दर्द जन्म से भुगत रही होती है वह उसके पिछले जन्मों के कारण से भुगतती है,जिसे संचित कहते है तथा जो भी कर्म बुद्धि,व संस्कार के वश से करती है उससे उसके अगले जन्म के प्रालब्ध का निर्माण होता है।
ईश्वरीय शक्ति अर्थात परमात्मा कभी भी आत्मा को सजा नही देता।वह तो केवल आत्मा को अपने बच्चो को पावन ,निर्मल,पाक,प्रेमयुक्त बनाना चाहता है।आत्मा जो भी भुगतती है वह आत्मा के ही समस्त कर्मो का हिसाब होता है।
आत्मा जैसे ही मनुष्य रूपी देह को परिधान करती है,तो अपनी कई दैवी शक्तियों को भूल जाती है।जिसके परिणाम में दुखी होती है।आत्मा मनुष्य देह में आते ही केवल दुसरो को देखने के सबसे घातक संस्कार से भर जाती है।दुसरो के बारे में सोचना ,देखना ,देना व लेना ये चारों दुसरो की बातों से उसे इस कदर प्रेम हो जाता है कि वह स्वयं के बारे में पूर्णता कमजोर हो जाती है।
आत्मा को चाहिए कि वह इस सृष्टि के जीवन मे कम से कम चार बाते याद रखे । माफी करना ।सबको माफ करना।ये बात अगर आत्मा की सच्ची आदत बन जाये तो आत्मा जन्नत तक जा सकती है।वह कभी भी किसी की भी बुरी ,ग़लत ,अपमान की बात को कभी अपने मन में न बिठायेऔर ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखे बल्कि उसे माफ़ करती रहे।
लेकिन माफ करने के लिए आत्मा को भूल जाना भी आना चाहिए।आत्मा जो जो करती है,उसमे जो अच्छा करती है उसे सदैव याद रखती है,तथा जो बुरा करती है उसे हमेशा भूल जाती है।अच्छे के बदले अच्छा परन्तु बुरे के बदले बुरा भी तो उसे ही भुगतना पड़ता है...!!उसे चाहिए कि,अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को वह भूल जाये, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखे।प्रतिलाभ की भावना क्यो पनपती है...कारण की खुद की मेहनत पर भरोसा नही होता।आत्मा को चाहिए कि वह अपने हर सच्चेकर्म पर विश्वास रखे।साथ ही साथ ईश्वर के अस्तित्व पर भी दृढ़ विश्वास रखे।इसलिए आत्मा को हमेशा अपनी मेहनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना चाहिए यही जीवन की सफलता का मुख्य सूत्र है ।
इस जीवन को जीते जीते आत्मा भटकने के कारण शब्दो के सत्य अर्थ से भी अपरिचित हो जाती है।वह लोभ में आती है ,जब कि जिस देह में वह स्थित होती है वह देह भी आत्मा की नही होती।इसी लोभ व मोह के कारण वह अपने शावत मूल्य विरक्ति अर्थात वैराग्य से भी मुँह मोड़ लेती है।उसे चाहिए कि वह हमेशा याद रखे कि जब मेरा जन्म हुआ है मुझे देह मिला है,तो निश्चित ही मुझे इस देह को छोड़ना भी है अर्थात एक दिन मरना भी है..! इसलिए बिना लिप्त हुए जीवन का आनंद लेना ही आत्मा का परम धर्म होना चाहिए !
मनुष्य जीवन प्रकृति ,पुरुष व कर्म के समिश्रण से बना है ।परन्तु इस सत्य को भूलने के कारण आत्मा आधा जीवन गलत लोगों से उम्मीद रखने में गुजारती है जिससे उसे दुख मिलता है और बाकी का आधा जीवन
वह सच्चे लोगों पर शक
करने में गुजर देती है जिससे वह दुख पाती है।परिणामवश वह कमज़ोर ही होती जाती है।
आत्मा को चाहिए कि
दूसरों से हुई गलतियों की ओर देखने से पहले वह खुद से हुई गलतियों पर ध्यान देंकर उन्हें सुधारें, क्योँकि आत्मा खुद से हुई गलतियों के कारण ही कठिनाई में पड़ती हैं।
आत्मा को अपना प्रालब्ध बनाने में लोगों की दुआ चाहिए और बददुवा मिलती है तो उसकी प्रालब्ध बिगड़ जाती है...!!अर्थात जो जैसा करता है ,उसे वैसा ही मिलता है, अतः चाहे कोई कुछ भी कर रहा हो, लेकिन सच्ची आत्मा को सदैव दुवा देकर अपनी शक्ति बनाने में ही लगानी चाहिए ...!!
आत्मा के सुंदर प्रवास के लिए इस जीवन के सारको समझना है, इससे उसका स्वभाव सरल होता है, अज्ञानी आत्मा का स्वभाव मिथ्या अभिमान ,अकड़ व स्वार्थ के साथ जटिलता तथा निकृष्ठता लिए हुए होता है।
वृषाली सानप काले
आत्मा अपने आप मे बेहद मजबूत होती है ,परन्तु उसके कर्म के परिणाम स्वरूप वह धक्का खाते फिरती है।कोई भी आत्मा किसी भी परिवार में किसी एक के साथ के हिसाब के लिए भी आती है ,तो कभी कभी हर एक सदस्य के हिसाब के लिए भी आती है।
आत्मा का हिसाब प्रेम का भी होता है तथा बैर,वैमनस्य,दुश्मनी,पद, सत्ता,व्यापार,पैसा तथा जायदाद का भी होता है।
हर एक भाव व घटना जो भी हर आत्मा के साथ घटती है ,वह अगर उसे दुखाकर या सुखाकर गयी है तो वह उसके खाते में जमा हो जाती है उसके अगले जन्म के लिए।
कभी कभी ज्ञानी आत्मा को कई तरह के दुख--दर्द का सामना भी करना पड़ता है,क्योँकि वह ज्ञानयुक्त आत्मा हिसाब चुक्तु करती जाते वक्त कई आत्मा उनकी वृत्ति व प्रवृत्ति के अनुसार उस पवित्र आत्मा के अच्छे संस्कारो का ग़लत इश्तेमाल करती है,जिसके कारण वश उस पाक आत्मा को तकलीफ युक्त जीवन का सामना करना पड़ता है।ऐसे समय मे कई लोग सत्य के प्रति अविश्वास व्यक्त करते है,परन्तु यह तो उस पवित्र आत्मा के भविष्य में होनेवाले देवता स्वरूप की बुनियाद बन रही होती है।यह हिसाब नही होता,यह प्रसंग तो निर्माण की परिक्षक होती है।
आत्मा स्वयं में योग्यता युक्त होते हुवे भी उसे सदैव इस सृस्टि चक्र कि पूरी परिक्रमा के लिए ईश्वरीय शक्ति से जुड़े रहना आवश्यक होता है।आत्मा के कर्म की गुह्यतम गति एवं उसकी क्रियात्मकता ही तथा उसके परिणाम से ही आत्मा उसके प्रालब्ध की निर्मिति करती है।
आत्मा जो भी दर्द जन्म से भुगत रही होती है वह उसके पिछले जन्मों के कारण से भुगतती है,जिसे संचित कहते है तथा जो भी कर्म बुद्धि,व संस्कार के वश से करती है उससे उसके अगले जन्म के प्रालब्ध का निर्माण होता है।
ईश्वरीय शक्ति अर्थात परमात्मा कभी भी आत्मा को सजा नही देता।वह तो केवल आत्मा को अपने बच्चो को पावन ,निर्मल,पाक,प्रेमयुक्त बनाना चाहता है।आत्मा जो भी भुगतती है वह आत्मा के ही समस्त कर्मो का हिसाब होता है।
आत्मा जैसे ही मनुष्य रूपी देह को परिधान करती है,तो अपनी कई दैवी शक्तियों को भूल जाती है।जिसके परिणाम में दुखी होती है।आत्मा मनुष्य देह में आते ही केवल दुसरो को देखने के सबसे घातक संस्कार से भर जाती है।दुसरो के बारे में सोचना ,देखना ,देना व लेना ये चारों दुसरो की बातों से उसे इस कदर प्रेम हो जाता है कि वह स्वयं के बारे में पूर्णता कमजोर हो जाती है।
आत्मा को चाहिए कि वह इस सृष्टि के जीवन मे कम से कम चार बाते याद रखे । माफी करना ।सबको माफ करना।ये बात अगर आत्मा की सच्ची आदत बन जाये तो आत्मा जन्नत तक जा सकती है।वह कभी भी किसी की भी बुरी ,ग़लत ,अपमान की बात को कभी अपने मन में न बिठायेऔर ना ही उसके लिए कभी प्रतिकार की भावना मन में रखे बल्कि उसे माफ़ करती रहे।
लेकिन माफ करने के लिए आत्मा को भूल जाना भी आना चाहिए।आत्मा जो जो करती है,उसमे जो अच्छा करती है उसे सदैव याद रखती है,तथा जो बुरा करती है उसे हमेशा भूल जाती है।अच्छे के बदले अच्छा परन्तु बुरे के बदले बुरा भी तो उसे ही भुगतना पड़ता है...!!उसे चाहिए कि,अपने द्वारा दूसरों के प्रति किये गए उपकार को वह भूल जाये, कभी भी उस किए गए उपकार का प्रतिलाभ मिलने की उम्मीद मन में न रखे।प्रतिलाभ की भावना क्यो पनपती है...कारण की खुद की मेहनत पर भरोसा नही होता।आत्मा को चाहिए कि वह अपने हर सच्चेकर्म पर विश्वास रखे।साथ ही साथ ईश्वर के अस्तित्व पर भी दृढ़ विश्वास रखे।इसलिए आत्मा को हमेशा अपनी मेहनत और उस परमपिता परमात्मा पर अटूट विश्वास रखना चाहिए यही जीवन की सफलता का मुख्य सूत्र है ।
इस जीवन को जीते जीते आत्मा भटकने के कारण शब्दो के सत्य अर्थ से भी अपरिचित हो जाती है।वह लोभ में आती है ,जब कि जिस देह में वह स्थित होती है वह देह भी आत्मा की नही होती।इसी लोभ व मोह के कारण वह अपने शावत मूल्य विरक्ति अर्थात वैराग्य से भी मुँह मोड़ लेती है।उसे चाहिए कि वह हमेशा याद रखे कि जब मेरा जन्म हुआ है मुझे देह मिला है,तो निश्चित ही मुझे इस देह को छोड़ना भी है अर्थात एक दिन मरना भी है..! इसलिए बिना लिप्त हुए जीवन का आनंद लेना ही आत्मा का परम धर्म होना चाहिए !
मनुष्य जीवन प्रकृति ,पुरुष व कर्म के समिश्रण से बना है ।परन्तु इस सत्य को भूलने के कारण आत्मा आधा जीवन गलत लोगों से उम्मीद रखने में गुजारती है जिससे उसे दुख मिलता है और बाकी का आधा जीवन
वह सच्चे लोगों पर शक
करने में गुजर देती है जिससे वह दुख पाती है।परिणामवश वह कमज़ोर ही होती जाती है।
आत्मा को चाहिए कि
दूसरों से हुई गलतियों की ओर देखने से पहले वह खुद से हुई गलतियों पर ध्यान देंकर उन्हें सुधारें, क्योँकि आत्मा खुद से हुई गलतियों के कारण ही कठिनाई में पड़ती हैं।
आत्मा को अपना प्रालब्ध बनाने में लोगों की दुआ चाहिए और बददुवा मिलती है तो उसकी प्रालब्ध बिगड़ जाती है...!!अर्थात जो जैसा करता है ,उसे वैसा ही मिलता है, अतः चाहे कोई कुछ भी कर रहा हो, लेकिन सच्ची आत्मा को सदैव दुवा देकर अपनी शक्ति बनाने में ही लगानी चाहिए ...!!
आत्मा के सुंदर प्रवास के लिए इस जीवन के सारको समझना है, इससे उसका स्वभाव सरल होता है, अज्ञानी आत्मा का स्वभाव मिथ्या अभिमान ,अकड़ व स्वार्थ के साथ जटिलता तथा निकृष्ठता लिए हुए होता है।
वृषाली सानप काले
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