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बंधनमुक्त चंद लड़ियां

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वो खुशी में सुकून मिला वो दिल में धड़कन बसी वो आग में शीतल हवा वो मीराज में मंज़िल रही वो तृषा में तृप्ति तू ही वो जान में जीवन है वो प्रेम में प्रीत लगी प्रिय तुम्हीं देखो ना  तारे वास्ते ही सारी  चंद लड़ियां प्यार की  जो चाहे चुनले राहबर  आना है या जाना जो चाहे करले पसंद सबकुछ है तेरे लिए 🌹🌹🌹🌹

टूटते बंधन

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हमें दिखा कर वो आईना,  कह रहे की चले जाओ  नहीं जरूरत हमें अब और किसी की तुम रहो अपने दायरे की हद में यही बताकर उन्होंने हमें  पल्ला भारी कर लिया अपना  सारी शिकायतें हमारे नाम सारी सिद्दतें अपने नाम कर ली  कुछ रहा नही बाकी अब  रुकने के लिए चले जाएं जिंदगी से उनकी  कर ऐसा वो यही चाहते है कि हम लौट कर ना आए कभी  वापस आने का रास्ता किया बंध दरवाज़े, खिड़की की किवाड़ों को कर लिया कुछ ऐसे बंध  झांक सके ना मेरी नज़र  उनकी खुशी में ही अपनी खुशी  यदि यही मर्जी तो यही सही  हमारे सर ओढ़ा कर  लज्जा का घूंघट कह दिया तुम्हारा कोई नही है यहां  ***

यादें

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जानेवाले नहीं आते लौटकर, उनकी याद आती है रह-रहकर कुछ मीठी यादें कुछ खट्टी बातें कर जाती है कुछ आंखें नम जैसे दिन सुना सा लगता है, रात खामोश कर जाती है कुछ दिल हिचकोले ले रहा, उनकी प्यारी यादों में खो कर  वापस कहां से लाएं हजूर ये तो ऊपरवाले का बुलावा है सिर्फ यादें बची पड़ी संदूक में अब गुजारा कर लेना यादों से

कोलाहल

मेरे खुदा, जबसे तुमसे मुलाकाते हुई क्या कहूँ की जिंदगी कितनी खूबसूरत हुई..!! तुम्हारी हर एक बात, मुझे अनायास सिखला गई... नही कोई होता यहां अपना अरी, हर शख्शियत है पराई...!! अब तक जो न उलझी थी वो हर सूक्ष्म सी भी लड़ी... वो हर प्रश्न बौछार सुलझी..थी जब बस रही तेरे संग मैं खड़ी...!! दर्द पीड़ा यातना संघर्ष कथा मन के कोलाहलो की कथा.. दर्द की अभिव्यक्ति जब होती तब नई कविता बनती जाती...!! ऐ खुदा ,अब हटे कोलाहल सारे तूफान भी तो लगते है सितारे... गुम हु प्यार में ही तुम्हारे... बन गए हम बस तुम्हारे...!! बन गए हम बस तुम्हारे...!! - वृषाली सानप काले

माँ हिंदी का पत्र

प्रति, मेरे समस्त  हिंदी प्रेमी बच्चे.. एवं भारतवासी...!!       मेरे प्रिय बच्चो,      हजारों लाखों प्रेमयुक्त आशीष ...!!जुग जुग जी लो..!!लंबे समय से यह पत्र तुम्हे लिखना चाहती थी,परन्तु शायद वह वक्त अभीतक नही आया था।आज वक्त की मांग अनुसार एवं परमात्मा के आदेश अनुसार यह बात समस्त इंसानों तक पहुंचाना मेरा कर्तव्य बन गया है।बच्चो मैंने पिछले 70-73 सालों से देखा है कि,तुम लोगो मे लगातार मुझे लेकर एक गुमनाम सी लड़ाई चल रही है।मैन देखा है कि ,मैं व मेरी बहनों के अस्तित्व को लेकर तुम इतने विवादात्मक स्थिति में खड़े हो जाते हो कि कभी कभी एक दूसरे की जान के दुश्मन भी बन जाते हो।मैन देखा है कि,इस विवाद में सभी विकारों को बढ़ावा भी तुम देते हो।कभी घृणा,जलसी,ईर्ष्या,दुश्मनी,निंदा,परित्याग,हिंसा तक करने पर आ जाते हो। बच्चो,पर तुम में से कई लोग यही नही जानते के आखिर मैं कौन हूं एवं कब से हूँ...! बच्चो मेरा अस्तित्व नाही स्वतंत्रता के वक्त से आया है ना ही उसके बाद मैं जन्मी हूँ..!!**हा, यह बात है कि जब मेरे व परमात्मा के अति प्रिय बच्चे इस सृष्टि के रंग...

कृष्ण

भारत एक महान देश के साथ साथ अद्वितीय इतिहास की संपदा से युक्त अलौकिक राष्ट्र है। सोने की चिड़िया है..!! ईश्वर का प्रिय देश है..!! अनुपम, महत्तम, श्रेष्ठतम, उच्चतम है..!!   भारत की साहित्यिक संपदा ही भारत की सही परिचायक है..!! भारत को विश्व के सामने चिरस्थापित करने में जिसका अविभाज्य भूमिका है..!!    लेकिन ऐसा होते हुवे भी, बावजूद इस गरिमा के, यह भी एक कटु सत्य है कि, भारत की अत्यंत गरिमायुक्त सत्य ज्ञान को मिथक ने नष्ट कर दिया है..!!  जी हाँ, मिथक ही वह है जो हमे सत्य से बहोत दूर तक ले गया है। हमने कभी भी मिथक की जड़े ढूंढने व जानने की कोशिश नही की, बस आंख बंद कर उसे सत्य के रूप में स्वीकार किया, बिना किसी शिकायत व आशंका को उठाये...!! क्यों..?? क्योँकि उन बातों का सम्बंध केवल लोगो की धार्मिक व भावनिक जज्बातों से होने के कारण कोई भी व्यक्ति सत्य को प्रत्यक्ष रखने व जानने की कोशिश से दूर होते ही रहे.. कभी भी नजदीक नही आये...!!   मिथक की सुरुवात उन दो महान व श्रेष्ठ महाकाव्यों से ही हो जाती है,जिनके ऊपर ही समूची साहित्यिक संस्कृति, सामाजिक, धार्मिक,...

जन्मदिन

जन्मदिन... अर्थात जन्म का दिन..!! हर एक के लिए यह दिन महत्ववपूर्ण होता है, परन्तु क्यो..?? जन्म लेकर हम इस सृष्टि रंगमंच पर अपनी भूमिका निभाने आते है, यह अत्यंत आनंद व खुशी की बात है। तथापि हर साल जन्म दिन क्यो मनाया जाता है..?? हर साल की बढोउती का तो यही अर्थ निकलता है, कि हमारी जिंदगी का एक साल गुजर गया..!! एक एक करते कितनी सारी जिंदगी हम गुजार देते है...!! कभी तो पीछे मुड़कर देखना चाहिए कि -  आजतक की जिंदगी हमने कैसे गुजारी...??  कितनो की जिंदगी सुधारी..??  कितनो की जिंदगी बिगाड़ी..??  कितनी आंखे पानी से भर दी..??  कितनी आंखों का पानी पिया..??  कितनो की दवा ली..??  कितनो की बद दुवा ली..??  कितनो को दुवा दी..??  कितनो को बद दुवा दी...??  कितने पल सफल बनायें..??  कितने पल बेकार गवाए..??  कितने मूल्य संस्कार स्वीकार लिए..धारण किये..??  कितने संस्कार नष्ट किये..??  इन सबका लेखा जोखा करने का पल याने निश्चित जन्मदिन...!! अगर इन प्रश्नों का उत्तर हाँ है... तो बहोत बढ़िया...!! परन्तु एक भी ना ह...