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Showing posts from February, 2018

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं

प्राचीन भारतीय आर्य भाषा की विशेषताएं : *        प्राचीन आर्य भाषा में 13 स्वर ध्वनियाँ थी। जिसमे 9 स्वर थे – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ॠ, लृ *        चार संध्य स्वर थे – ए, ऐ, ओ, औ *        ‘ऐ’ और ‘औ’ का उच्चारण क्रमशः ‘आई’ एवं ‘आउ’ होता था। *        व्यंजनों के पांच वर्ग बन चुके थे – 1)      क वर्ग 2)      च वर्ग 3)      ट वर्ग 4)      त वर्ग 5)      प वर्ग *        इसके अतिरिक्त चार अर्ध स्वर – [ य, र, ल, व ] एवं तीन उष्म – श, ष, स तथा एक महाप्राण ‘ह’ ध्वनियाँ थी। *        एक अनुनासिक (ं) एवं एक विसर्ग (ः) भी था। शब्दों के रूप, लिंग (तीन), वचन (तीन) एवं कारक (आठ) के आधार पर बनते थे। *        विशेषण संज्ञा के समान ही परिवर्तित होते थे। सर्वनामों के रूप मे...

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें

संस्कृत भाषा के शब्द भंडार से सम्बंधित बातें : संस्कृत भाषा का शब्द भंडार अक्षय और अनंत है। इस भाषा का शब्द निर्माण कितना वैज्ञानिक है कि आवश्यकता अनुसार प्रत्येक विषय के नविन शब्दों का निर्माण सरलता से उत्पन्न हो जाता है। हिंदी में डॉ. रघुवीर ने संस्कृत के आधार पर ही एक बृहत् कोष तैयार किया है। जिसमें  विज्ञानं, अर्थशास्त्र, चिकित्सा, अभियंत्रणा, तकनीकी प्राविधि की और प्रशासन  के अंग्रेजी शब्दों का हिंदी में अनुवाद मौजूद है। विक्रमकालिन महाकवि कालिदास से पूर्व संस्कृत साहित्य का पूर्ण विकास हो चूका था. कालिदास के प्रादुर्भाव से (आगमन से) संस्कृत साहित्य और भाषा में एक नूतन आभा और प्रतिभा छिटकी। जिस की चमक आज भी विद्यमान है।  ‘अभिज्ञानशाकुंतलम्’, ‘मेघदूत’, कुमारसंभव’  आदि उनके अद्वितीय ग्रन्थ है। कालिदास की रचनाएँ  ‘न भूतो न भविष्यति’  का वास्तविक उदहारण है।  अश्वघोष ,  भारवी ,  माघ ,  श्री हर्ष  आदि महा महाकवियों ने कालिदास की शैली का अनुशरण किया। हिन्दी के रीतिकालीन और ब्रजभाषा के अनेक कवियों ने कालिदास को अपना आदर्श माना है...

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओँ का विकास

प्राचीन भारतीय आर्य भाषाओँ का विकास :       भारतीय आर्य भाषाओ का विकास लगभग साढ़े तिन हजार वर्षो का है। ‌‍ भारतीय आर्य भाषाओ का इतिहास ईसासे लगभग  1500 ई.पूर्व  आरंभ होता है। विद्वानों का मानना है कि अपने मूल स्थान से चलकर भारत ईरानी लोग  ओकसस घाटी  के पास आए। वहाँ से फिर उनका एक वर्ग  ईरान   चला गया, दूसरा  कश्मीर   तथा उसके आस-पास, तीसरा  भारत ।       भारत में अर्यो के आने के बाद से उनकी भारतीय आर्य भाषा का इतिहास शुरू होता है। भाषा शास्त्रीयों का मानना है कि आर्यों के भारत आगमन से पूर्व यहाँ  नेग्रोटी, ऑस्ट्रिक, किरात, द्रविड़  जातियां रहा कराती थी।       आर्य जातियों की भाषा को ‘आर्य भाषा’ कहते है।  गुजरात, बिहार, बंगला, आसाम, उत्तर भारत, मध्य भारत  में आर्यों की प्रधानता थी। दक्षिण में  कर्णाटक, आंध्र प्रदेश ,  केरल  में  द्रविड़ो  का प्रभुत्व था। इसी आर्य भाषा से भारत की अन्य आधुनिक आर्य भाषाओँ का विकास ...

काव्य मंजरी – कबीर के दोहे

काहे री नलनी तूँ कुम्हिलाँनीं , तेरे ही नालि सरोवर पाँनी। जल में   उतपति जल में निवास ; जल में नलनी तोर निवास। ना तलि तपति न ऊपरि आगि , तोर हेतु कहु कासनि लागि कहे कबीर से उदिक समान , ते नहीं मूए हँमरे जाँन॥ दर्शनशास्त्र में   जीवात्मा से  सम्बंधित बात करते है , वैसे ही   कबीरदास   जी भी ऐसे   दार्शनिक सम्बन्ध की बात करते है। वे यहाँ  उदहारण के    कहते है कि  - कमल पुष्प ऐसा पुष्प है जो पानी में जन्म लेता है।  उसका जीवन पानी से शुरू होकर , अंत भी पानी में ही होता है। यह कमल पुष्प का सम्बोधन मनुष्य के   मन जीवात्मा को ध्यान में रखके   की गई है। कवि ने कमल पुष्प से सवाल किया कि तु  मुरझा क्यों रही है ? यहाँ दुःख का कारण   मन से है।  जब मनुष्य का मन दुःखी   हो तब वह जीवन के लिए जीवन के तत्व जरुरी है।  कमल  पुष्प का जीवन   पानी है। Ø   जल में उत्पत्ति जल में निवास....   कवि पुष्प से कहते है कि  तेरा सम्बन्ध जिससे जुड़े है वह पानी से तुझे अलग भी नहीं कि...

कालिदास – नागार्जुन

कालिदास! सच-सच बतलाना इन्दुमती के मृत्युशोक से अज रोया या तुम रोये थे ? कालिदास! सच-सच बतलाना! शिवजी की तीसरी आँख से निकली हुई महाज्वाला में घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम कामदेव जब भस्म हो गया रति का क्रंदन सुन आँसू से तुमने ही तो दृग धोये थे कालिदास! सच-सच बतलाना रति रोयी या तुम रोये थे ? वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका प्रथम दिवस आषाढ़ मास का देख गगन में श्याम घन-घटा विधुर यक्ष का मन जब उचटा खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर चित्रकूट से सुभग शिखर पर उस बेचारे ने भेजा था जिनके ही द्वारा संदेशा उन पुष्करावर्त मेघों का साथी बनकर उड़ने वाले कालिदास! सच-सच बतलाना पर पीड़ा से पूर-पूर हो थक-थककर औ '  चूर-चूर हो अमल-धवल गिरि के शिखरों पर प्रियवर! तुम कब तक सोये थे ? रोया यक्ष कि तुम रोये थे! कालिदास! सच-सच बतलाना!       नागार्जुन की यह कविता छोटी होते हुए भी शिल्प की द्रष्टि से महत्वपूर्ण है. इसमें कविने कविता की रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डाला है. इस में नागार्जुन बताते है कि कवि अपनी रचनाओ में दुःख, व्यथा, पीड़ा आदि का चित्रण करते है. परन्तु उसके लिए उसे स्वयं वेदना और पीड़ा...

नमस्कार

नमस्कार मित्रों , हिंदीकल्प में आपका स्वागत है --- - कौशल्या वाघेला