पल के जुगनू
तेरी मेरी बिखरी बातों के,
यादों के समंदर से
कुछ मोती छांटकर मैंने,
पिरोए एक माला में
जो बनकर कविता
निकली मेरे हृदय से..
मत कह कि,
तेरे बिना मैं नहीं...
मैं तो तेरे अंदर ही समाई हूं
महसूस कर मेरी मौजूदगी को
तेरे दिल के हाल से..
वाकिफ़ हूं मैं..
मुझसे छिपा नहीं कुछ
तेरा दर्द ए ज़ख्म..
तेरी आवाज़, तेरी नज़रे..
चुगली कर दिया करती है अक्सर..
चाहे ज़ुबां से कुछ भी कह लो
तेरे ही इर्द-गिर्द मेरी ज़िन्दगी
हर हसरत को करुं पूरी...
यही अरमान है मेरा..
तेरे भावनाओं पर,
जान छिड़क कर..
जन्नत को तेरे कदमों में धर दूँ..
आनंदीत हो तेरा मन...
खुशियों की बरखा कर दूं..
यादों के समंदर से
कुछ मोती छांटकर मैंने,
पिरोए एक माला में
जो बनकर कविता
निकली मेरे हृदय से..
मत कह कि,
तेरे बिना मैं नहीं...
मैं तो तेरे अंदर ही समाई हूं
महसूस कर मेरी मौजूदगी को
तेरे दिल के हाल से..
वाकिफ़ हूं मैं..
मुझसे छिपा नहीं कुछ
तेरा दर्द ए ज़ख्म..
तेरी आवाज़, तेरी नज़रे..
चुगली कर दिया करती है अक्सर..
चाहे ज़ुबां से कुछ भी कह लो
तेरे ही इर्द-गिर्द मेरी ज़िन्दगी
हर हसरत को करुं पूरी...
यही अरमान है मेरा..
तेरे भावनाओं पर,
जान छिड़क कर..
जन्नत को तेरे कदमों में धर दूँ..
आनंदीत हो तेरा मन...
खुशियों की बरखा कर दूं..
सिमट कर पल के जुगनुओं को..
मैंने मन भर लिया...
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- कौशल्या वाघेला
Kaya khoob Likha he
ReplyDeleteधन्यवाद महोदय 🙏
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