तनहा
मेहसूस नहीं था की तन्हा हु आजकल
तुमने सवाल छेड़कर अच्छा न किया।।
एहसास नहीं था की दिल रोता है अक्सर
तुमने खरोचे निकालकर अच्छा नहीं किया।
शिकवा नहीं था इन रंजो गम का शायद
तुमने घावो को रौंदकर अच्छा नहीं किया।
गीला नहीं था भले बाज था ये जीवन
तुमने फांसा फेंककर अच्छा नहीं किया।।
दाग नहीं था की बेदाग़ ही है जीवन
तूने ताने बेतुके कसकर अच्छा नहीं किया।।
इल्ज़ाम नही थी पर फक्र था खुद पर
तुमने दुश्मनी जताकर अच्छा नहीं किया।।
जीना तो नहीं था हमे मरना ही तो था
तुमने जीते जी मारकर अच्छा नहीं किया।।
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- वृषाली सानप काळे
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