काव्य मंजरी – कबीर के दोहे
काहे री नलनी तूँ
कुम्हिलाँनीं,
तेरे ही नालि सरोवर
पाँनी।
जल में उतपति जल में निवास;
जल में नलनी तोर
निवास।
ना तलि तपति न ऊपरि
आगि,
तोर हेतु कहु कासनि
लागि
कहे कबीर से उदिक
समान,
ते नहीं मूए हँमरे
जाँन॥
दर्शनशास्त्र में जीवात्मा से सम्बंधित बात करते है, वैसे ही कबीरदास जी भी ऐसे दार्शनिक सम्बन्ध की बात करते है। वे यहाँ उदहारण के कहते है कि - कमल पुष्प ऐसा पुष्प है जो पानी में
जन्म लेता है। उसका जीवन पानी से शुरू होकर, अंत भी पानी में ही होता है। यह कमल पुष्प का सम्बोधन मनुष्य के मन जीवात्मा को ध्यान में रखके की गई है। कवि ने कमल पुष्प से सवाल किया कि तु मुरझा
क्यों रही है ? यहाँ दुःख का कारण मन से है। जब मनुष्य का मन दुःखी हो तब वह जीवन के लिए जीवन के तत्व जरुरी है। कमल
पुष्प का जीवन पानी है।
Ø
जल में उत्पत्ति
जल में निवास....
कवि पुष्प से कहते है कि
तेरा सम्बन्ध जिससे जुड़े है वह पानी से तुझे अलग भी नहीं किया फिर भी तु
क्यों मुरझा रहा है।
Ø
ना तलि तपति न
ऊपरि आगि.....
तेरे मूल में किसी भी प्रकार की
आग नहीं है।
जहाँ जन्म हे तेरा वहाँ ऊपर के स्थान पर भी आकाश के सूर्य का ताप तू सहन नहीं कर
सकती, मगर तू तो पानी में निवास कराती है इस लिए तेरा गुण शीतलता का है। फिर भी
ईएसआई क्या पीड़ा है तुझे सभी सनुकुलता होने से भी तू मुरझा रहा है।
Ø कहे कबीर
जे उर की समान...
कवि ने अंत
में कहा कि यह सरोवर है उसमे तेरा तादात्म्य नहीं हो रहा। तुझे ऐसा लगता है कि अगर
तू बड़े सरोवर में होती तो तू प्रसन्न रहती। जब तक पानी है तब तक तू खिली रहती,
तेरा जीवन बना रहता। दुःख का कारण बाह्य नहीं होता, आतंरिक होता है। मन बाह्य
परिस्थिति के अनुकूल नहीं होना चाहती इस लिए मन दु:खी होता है। यहाँ कमल पुष्प को
ध्यान में रखके मनुष्य के मन की स्थिति का तादात्म्य किया गया है।
कबीर कहते है
कि दु:खी होने का कारण यह है कि परमात्मा के साथ जीवात्मा का तादात्म्य नहीं है।
परमात्मा की अनुभूति से जीवात्मा को सुख देता है।
Ø
उद्देश : मनुष्य को
निरंतर परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। इस प्रकार से जीवात्मा के सुख का कारण
परमात्मा से एकाकार होता है।
- कौशल्या वाघेला
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