इल्तजा
रंग में रंगने की है इल्तजा
भंग न करना रे ये प्रार्थना।
ज्योत हुं दिए की
तू मेरी आभा
गहराई नाप लो
मैं तेरा गाभा
अद्वैत दोनों ना शमा न परवाना।।
रिश्ता है पीड़ा
दर्द की भाषा
जिस्म है सजा
एक है आत्मा
अमर्त्य जीवन ही अभिलाषा।।
रंग न कोई
दंभ न कोई
संग न कोई
साथ न कोई
श्याम हो मेरे अब मैं बनु राधा।।
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वृषाली सानप काळे
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