गुरु

अंतर्मुख तथा गंभीरता से
सिखलाए बनो तुम निरहंकारी..।

गुरु ही तो जीवन धारा की
भवसागर से नैया पार करी..।

बन सच्चा मधुर तू  सेवाधारी
न गाये महिमा न अहंकारी..।

सहनशीलता का कुशल व्यापारी
गुरु बिन कौन यह व्रत आचारी.।

गुरु ज्ञान सागर मैं तो एक सिंधु
गुरु पुरवैय्या मैं तो एक बिंदु...।

गुरु भास्कर सम मैं तो दीपक हु
गुरु महत्तम मैं तो नतमस्तक हु.।

ऋण ऋण में तेरे तो मैं डूबा हु
कण कण गुरु का अब हिस्सा हु।
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- वृषाली सानप काले 

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