मुकद्दर

जख्म सीकर भी हर पल हंसाता रहा
कफ़न बांधकर भी जिलाता रहा

जो हुवे थे गुनाह जिंदगी से हमारे
वक्त भी उसकी कीमत चुकाता रहा

आजमाते ही रहे वो रुलाते रहे
खामोश बन तमाशे को मिलाता रहा

सब देते रहे तौफे इल्जामों के पर
ये पाकिज दिल उल्फ़ते वफ़ा निभाता रहा

हम तो कुर्बान थे नेकी के राह पर
सरफरोशी का नशा दीवाना बनाता रहा

पुचकारा, सराहा, झकझोरा जग ने
दर्दे दिल तो सभी से दर्द छुपाता रहा

ये खुदा का बन्दा तो फरिश्ता बनके
बेडर बन मौत से मिलता ही रहा

अर्थी जनाजा से ना लागे डर
ये तो कर्मो से मुकद्दर सजाता रहा
🌱
- वृषाली सानप काले

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