खुदा
कितनी गवाई तूने जिंदगी
फिर भी न जानी वो बन्दगी
खुदा खुदाई उसकी सादगी
हसीन प्यारी है वो बन्दगी
देखो न ढूंढो उसकी ताजगी
दिल से पुकारो है लाजमी
अम्बर से परे जहां से न्यारे
अलौकिक पाक है वो जिंदगी
साकार नही वो समस्त नही
कटे न फटे वो तो अस्त नही
निर्माण स्वरूप वो ध्वस्त नही
संवारे आत्मा की आवारगी
ज्ञान गुण प्रेम वो है नीति
निराकार है वो है ये निश्चिती
भांप न पावोगे उसकी गति
अब तो जागो बीतेगी जिंदगी
🙏
- वृषाली सानप काले
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