वस्तु नही हु मैं... (on Women's Day)
रोज की नयी सुबह की दहलीज में
पड़नेवाली कोई
अखबार नहीं हूँ मै...
हर सुबह-सुबह जन्मकर
शाम को
फेंकी जानेवाली
रद्दी भी नही हु मैं...!!
किसी भी दीवार के
कोने में लटका हुवा
कैलेंडर भी नहीं हूँ मैं...!!
नाही समारोह की पूजा की थाली एवं
जुड़े में खोंसी गयी माला
या कोई
सुगंधित फूल
वो भी नहीं हूँ मैं...!!
गौर से सुना ही दु
अब
मैं भी इस जग को
के खिड़की की किसी
कांच में
सटकर लगी
धूल भी नही हूँ मैं...!!
शोभा नही,साज नही,
आभा नही,अंदाज नही
वाद नही,राग भी नही...
एक बुलन्द आवाज हु मैं..!!
अंत भी
तथा आगाज भी हु मैं..!!
एक जिंदादिल इंसान हु मैं...!!
सुनो....कोई वस्तु नही हु मैं...!!
इसलिए अब
पोंछकर साफ
करना ही होगा तुम्हे
प्रथा,परम्परा,व्यवस्था का आईना...!!
हवस,वासना व दम्भ से युक्त इस समाज
के हवेली की
खिड़की की कांच में
लगा अंधविश्वास,
अनैतिकता व आडम्बर का दाग...!!
विश्व की शांति ,सुकून व नारी के सम्मान के लिए...!!
- वृषाली सानप काले
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