निराकारी लौ
वे
टाली पे टाली
बजा रहे थे,
खुद ही खुद की
लाल किये जा रहे थे..!!
कितनी खूबसूरती से
उसे रास्ते से हटा दिया...
सोच सोच हसे जा रहे थे...!!
.. कितने नादान है वे...
हम भी सोच रहे थे..!!
जब हम कभी भी
किसी के राहों में
खड़े ही नही थे..!!
जब हम किसी को
वैरी मानते ही न थे..!!
किसी के न आगे जाना था
न किसी के हम पीछै थे..!!
हमे कोई क्या हटाये...
हम तो अमिट बने थे...!!
सबको समाने वाले,
सबको जिलाने वाले
हम एक निराकार लौ थे...
रास्ते से हटते नही
रास्ते को भी हटाते नही..
हम तो खुद रास्ते बनाते है...!!
- वृषाली सानप काले
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