सियासत
काहें को ये दरमियां
क्यो सियासत
भी उसुल से खेले है
मक़सद दुजा तो
कोई भी नहीं
मुझे तो बगावत भी
लागे फ़िजूल है...!!
जहां रियासत कसबे रौदे हो...
तथा सियासत मौके तौले हो...
बेकार ही बेकार वहा न्याय क्या हो
न अंत सही न सही आगाज हो...!!
जबसे होश है सवारा..
जन्म भाषा को दिया किनारा..
सिसके तेरे लिये कतरा-कतरा..
न जता की इबादत भी फ़िजूल है...??
अजब कमाल है युगो से
वो करते जाते है..
अजब गुमान है युगो से
हम सहते जाते है...
खामोशी से सहते गये
की अब तो मसले
सुलझ जाये...
बंद होठो के सहारे से
सोचे की मौन रहे
के न उलझ जाये
हद मे बरसे या
की बेहद मे...
बारीश तो पानी है
लहू से ही घायल
सारी 'तेरी कहानी है...!!
जो नायाब भी है
अनमोल भी है...
है पर आज भी
वही प्रश्न
तू बेखॉफ क्यो न है..??
जो चाहे, जब चाहे, भरी गली, खुली सडक में..
तुझे रौदे, तोडे, तुझे लूटे
हम फिर भी ...
खामोश क्यों है..??
बे अब्रू कर 'तेरी बेइज्जती
के जशन मे
जहर पिते ये आँँख नम क्यों है...??
तुझसे हे बेइंतहा चाहत
तेरे लिये ये बगावत
बस तुझसे ही उलफत
ये पाकीज अदावत क्यों है..??
कण कण से तुटे
सब्र से छुटे..
फिर भी माँ हिंदी
बस तेरे प्यार के अंधे...!!
अब तू ही बता..
ये रिशता क्या है...
ये रिशता क्या है...
- वृषाली सानप काळे
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